वक़्त, मैं और किस्मत : समय-बोध, संवेदना और आत्मसंघर्ष की काव्य-यात्रा
समकालीन हिंदी कविता के परिदृश्य में “वक़्त, मैं और किस्मत” एक ऐसी कृति के रूप में उभरती है, जो निजी अनुभवों को व्यापक मानवीय संदर्भों से जोड़ने का सार्थक प्रयास करती है। यह संग्रह केवल कविताओं का संकलन नहीं, बल्कि एक संवेदनशील मन की आत्मकथा है, जो समय, नियति और मनुष्य के बीच चल रहे जटिल संवाद को शब्दों में रूपायित करती है।
समय की केंद्रीय उपस्थिति
इस काव्य-संग्रह की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता इसका समय-बोध है। कवि ‘वक़्त’ को केवल काल-गणना का माध्यम नहीं मानता, बल्कि उसे एक जीवंत सत्ता के रूप में प्रस्तुत करता है। समय यहाँ कभी कठोर शिक्षक है, कभी मौन साक्षी और कभी जीवन की दिशा तय करने वाला अदृश्य नियंता। कविताओं में बार-बार यह अनुभव उभरता है कि मनुष्य अपनी इच्छाओं और प्रयत्नों के बावजूद समय के प्रभाव से मुक्त नहीं हो सकता।
कवि समय से संवाद करता है, उससे प्रश्न करता है और कई बार उससे संघर्ष भी करता है। यह संघर्ष व्यक्तिगत होते हुए भी सार्वभौमिक है। पाठक अपने जीवन के अनुभवों को इन पंक्तियों में प्रतिबिंबित पाता है।
आत्ममंथन और अस्तित्व की खोज
“वक़्त, मैं और किस्मत” का दूसरा प्रमुख आयाम आत्ममंथन है। संग्रह की अनेक कविताएँ ‘मैं’ की खोज पर केंद्रित हैं। कवि स्वयं से पूछता है— मैं कौन हूँ? मेरा वजूद क्या है? जीवन का अर्थ क्या है?
यह आत्मसंवाद केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि दार्शनिक धरातल पर भी सक्रिय है। कविताओं में अस्तित्ववादी चेतना की झलक मिलती है, जहाँ जीवन की क्षणभंगुरता और अनिश्चितता को स्वीकारते हुए भी मनुष्य अर्थ की तलाश करता है।
कवि का ‘मैं’ आत्मकेंद्रित नहीं है; वह समाज, संबंधों और परिस्थितियों से निरंतर प्रभावित होता है। यही कारण है कि निजी अनुभूति भी सामूहिक संवेदना का रूप ले लेती है।
प्रेम का बहुआयामी स्वरूप
संग्रह में प्रेम एक महत्त्वपूर्ण भावभूमि के रूप में उपस्थित है, किंतु यह प्रेम केवल रूमानी या सौंदर्यपरक नहीं है। यहाँ प्रेम प्रतीक्षा है, विरह है, मौन स्वीकृति है और कभी-कभी आत्मबलिदान भी।
कवि प्रेम को जीवन का आधार मानता है, परंतु वह उसकी जटिलताओं से भी परिचित है। कई कविताओं में अधूरा प्रेम अपनी करुणा के साथ उपस्थित होता है। प्रेम की असफलता यहाँ निराशा का कारण नहीं, बल्कि आत्मचिंतन का अवसर बन जाती है।
इस प्रकार संग्रह में प्रेम जीवन की ऊर्जा भी है और संवेदना की कसौटी भी।
स्त्री-विमर्श और सामाजिक दृष्टि
संग्रह की एक उल्लेखनीय विशेषता इसका स्त्री-विमर्श है। कवि ने स्त्री-अस्तित्व की पीड़ा, संघर्ष और गरिमा को संवेदनशीलता के साथ अभिव्यक्त किया है। स्त्री यहाँ दया की पात्र नहीं, बल्कि संघर्षशील और आत्मसम्मान से युक्त व्यक्तित्व के रूप में उभरती है।
कविताएँ समाज में व्याप्त लैंगिक असमानताओं और रूढ़ियों पर प्रश्नचिह्न लगाती हैं। कवि की दृष्टि सहानुभूतिपूर्ण होने के साथ-साथ आलोचनात्मक भी है।
इसके अतिरिक्त, संग्रह में सामाजिक यथार्थ की भी स्पष्ट उपस्थिति है। व्यवस्था की विसंगतियाँ, नैतिक पतन, और मानवीय संबंधों की जटिलता कविताओं के माध्यम से उजागर होती हैं। कवि किसी आक्रामक भाषा का प्रयोग नहीं करता, बल्कि सरल शब्दों में गहरी चोट करता है।
भाषा और शिल्प
“वक़्त, मैं और किस्मत” की भाषा इसकी सबसे बड़ी शक्ति है। कवि ने अलंकारों और जटिल प्रतीकों की अपेक्षा सहज अभिव्यक्ति को प्राथमिकता दी है। मुक्तछंद शैली का प्रयोग कविताओं को स्वाभाविक प्रवाह प्रदान करता है।
शब्द चयन सरल है, किंतु भाव गहरे हैं। यही संयम और संतुलन कविताओं को प्रभावशाली बनाता है। पाठक को अर्थ ग्रहण करने में कठिनाई नहीं होती, परंतु अर्थ की गहराई उसे सोचने पर विवश करती है।
हालाँकि, कुछ स्थानों पर विषय-विस्तार और भावों की पुनरावृत्ति दिखाई देती है। यदि संपादन और सघन होता, तो प्रभाव और तीव्र हो सकता था। फिर भी यह कमी संग्रह की मूल संवेदनात्मक शक्ति को कम नहीं करती।
संवेदना की प्रामाणिकता
इस कृति की सबसे बड़ी उपलब्धि इसकी प्रामाणिकता है। कविताएँ बनावटी या कृत्रिम नहीं लगतीं। ऐसा प्रतीत होता है मानो कवि ने जो जिया है, वही लिखा है। अनुभव की सच्चाई पाठक तक सीधे पहुँचती है।
यह संग्रह पाठक को केवल पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि महसूस करने के लिए आमंत्रित करता है। कई कविताएँ आत्मचिंतन को प्रेरित करती हैं और जीवन के छोटे-छोटे प्रश्नों को नए दृष्टिकोण से देखने की प्रेरणा देती हैं।
समकालीन संदर्भ में महत्त्व
आज के समय में जब कविता कई बार अत्यधिक बौद्धिक या अत्यधिक प्रयोगवादी हो जाती है, “वक़्त, मैं और किस्मत” संतुलन का उदाहरण प्रस्तुत करती है। यह न तो अत्यधिक जटिल है और न ही सतही।
यह संग्रह उन पाठकों के लिए विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है जो कविता में अपनी भावनाओं का प्रतिबिंब खोजते हैं। यह पुस्तक युवा पाठकों के साथ-साथ गंभीर साहित्य प्रेमियों के लिए भी पठनीय है।
निष्कर्ष
समग्र रूप से “वक़्त, मैं और किस्मत” एक संवेदनशील, आत्मविश्लेषी और सामाजिक चेतना से युक्त काव्य-संग्रह है। इसमें समय का दार्शनिक बोध है, प्रेम की करुणा है, स्त्री-अस्तित्व की सजग पहचान है और समाज के प्रति उत्तरदायित्व का भाव भी।
यद्यपि संपादन की दृष्टि से कुछ स्थानों पर कसावट की गुंजाइश है, फिर भी यह संग्रह अपनी भावनात्मक गहराई और सहज भाषा के कारण पाठकों पर स्थायी प्रभाव छोड़ता है।
यह कृति इस बात का प्रमाण है कि कविता आज भी मनुष्य और समय के बीच संवाद का सशक्त माध्यम है।
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