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तेरह नंबर वाली फायर ब्रिगेड (कहानी) - तरुण भटनागर

तेरह नंबर वाली फायर ब्रिगेड (कहानी)/                              कहते हैं यह एक सच वाकया है जो यूरोप के किसी शहर में हुआ था।          बताया यूँ गया कि एक बुजुर्ग औरत थी। वह शहर के पुराने इलाके में अपने फ्लैट में रहती थी। शायद बुडापेस्ट में, शायद एम्सटर्डम में या शायद कहीं और ठीक-ठीक मालुमात नहीं हैं। पर इससे क्या अंतर पडता है। सारे शहर तो एक से दीखते हैं। क्या तो बुडापेस्ट और क्या एम्सटर्डम। बस वहाँ के बाशिंदों की ज़बाने मुख्तलिफ हैं, बाकी सब एक सा दीखता है। ज़बानें मुख्तलिफ हों तब भी शहर एक से दीखते रहते हैं।             वह बुजुर्ग औरत ऐसे ही किसी शहर के पुराने इलाके में रहती थी, अकेली और दुनियादारी से बहुत दूर। यूँ उसकी चार औलादें थीं, तीन बेटे और एक बेटी, पर इससे क्या होता है ? सबकी अपनी-अपनी दुनिया है, सबकी अपनी अपनी आज़ादियाँ, सबकी अपनी-अपनी जवाबदारियाँ, ठीक उसी तरह जैसे खुद उस बुजुर्ग औरत की अपनी दुनिया है, उसकी अपनी आज़ादी। सो साथ रहने का ...

एक रात की मेहमान (कहानी) - मालती मिश्रा

कहानी- एक रात की मेहमान  जेठ की दुपहरी थी बाहर ऐसी तेज और चमकदार धूप थी मानों अंगारे बरस रहे हों ऐसे में यदि बाहर निकल जाएँ तो ऐसा लगता मानो किसी ने शरीर पर जलते अंगारे रख दिए, घर के भीतर भी उबाल देने वाली गर्मी थी, अम्मा, दादी, छोटी दादी और मंझली काकी सब हमारे ही बरामदे और गैलरी में बैठे थे क्योंकि गैलरी दोनों ओर से खुली होने के कारण अगर पत्ता भी हिलता तो गैलरी में हवा आती थी, बाबूजी और छोटे काका बरामदे से उतरकर जो आम का छोटा सा पेड़ था उसी की छाँव में चारपाई पर बैठे बतिया रहे थे। मैं और मेरे तीनों छोटे भाई अम्मा के डर से सोने की कोशिश कर रहे थे, कितनी भी गर्मी हो हम तो खेल-खेल में सब भूल जाते थे पर घर के बड़े हम बच्चों की भावनाओं को समझे बिना ही जबरदस्ती 'लू लग जाएगी' कहकर सुला देते, कितना कहा था अम्मा से कि धूप में नहीं खेलेंगे, काका की घारी में खेल लेंगे पर वो भला कहाँ मानने वाली थीं, डाँट-डपट कर सुला दिया। बीच-बीच में भाई कोहनी मारता अम्मा सो गईं?  "चुप, वो बैठी हैं।" कहकर मैं आँखें मूंदकर सोने का उपक्रम करती। तभी बाहर से बातों की आवाजें पहले की अपेक्षा...

मुक्ति (कहानी) - अबीर आंनद

 आपूर्ति भवन के सामने वाले बस अड्डे पर, वह रोजाना की तरह अपनी बस का इंतज़ार कर रहा था ।  वह सुयोग राणा था ।  राज्य सरकार के आपूर्ति विभाग में एक अधिकारी ।  हाथ में एक छोटा सा पर्स नुमा बैग था ।  शायद किसी परिचित दुकानदार ने दिया था ।  थोक व्यापारियों को अक्सर ऐसे बैग, गुटखा और खैनी बनाने वाली कम्पनियाँ उपहारस्वरूप दे देती हैं ।  और ये व्यापारी फिर इन्हें अपने परिचितों को हस्तांतरित कर देते हैं ।  शक्ल सूरत कोई खास नहीं थी ।  पर कद काठी लुभावनी थी ।  उसका सादा पहनावा ,  उसके पौने छः फुट के आस पास के कद ,  और चौड़े सीने पर बिलकुल भी नहीं फबता था ।  क्रीम रंग की शर्ट उसके गहरे हरे रंग की पतलून के ऊपर बाहर से ही लटक रही थी ।  आम तौर पर लोग ,  और विशेषतः अधिकारी लोग, शर्ट को पतलून के अन्दर ठूँस कर पहनते हैं ।  खैर ,  राजधानी में राज्य सरकारों के मुख्य भवनों पर बैठने वाले अधिकारी तो, यूँ सुयोग राणा की तरह सिटी बस में भी सफ़र नहीं करते ।  ऐसे कई मामलों में वह अन्य अधिकारियों से एकदम अलग था । ...