दिवाली पर प्रकाशक (राजपाल एंड सन्स) ने तोहफ़ा दिया है... और किताब अब आप सबके हाथ में है... यह सिर्फ एक "स्त्री" की नहीं बल्कि आपकी-मेरी हम सबकी माँ की कहानी है किताब ऑर्डर करने के लिए लिंक : अमेज़न प्री-बुकिंग लिंक पुस्तक 'मैं से मांँ तक' हम सभी ने अपनी माँ को माँ बने हुए देखा... माँ बनते हुए नहीं। बच्चे के जन्म के बाद से लेकर उसके परिपक्व हो जाने और उसके भी बच्चे हो जाने तक की यात्रा आजीवन चलती है। घर-परिवार, माहौल, समाज सभी इसमें सहयोगी होते हैं। मगर वे नौ माह जब बच्चा माँ के भीतर उसी का अंग बनकर पलता है, वे दोनों एक ही शरीर की तरह जीते हैं, कैसे होते हैं वे नौ माह? ख़ुशख़बरी मिलने के पहले दिन से लेकर बच्चे के जन्म तक के नौ माह एक बेहद अनोखी और एहसासों के अलग-अलग रंगों से सराबोर यात्रा रहती है। हिंदुस्तान में आज भी स्त्री के लिए माँ बनना वैसा ही है जैसे जीने के लिए साँस लेना। कोई भी स्त्री माँ 'न बनना' न ख़ुद चुनती है न चुन सकती है। अब बदलते ज़माने में आत्मनिर्भर स्त्री शादी न करना चुनने की हिम्मत जुटाने लगी है, मगर वह अकेली स्त्री भी ...
"एक प्रयास.., मुकम्मल प्रस्तुति का"