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कहां से आता है प्रकाश - ध्रुव गुप्त

                          (चित्र साभार : गूगल) कहां से आता है प्रकाश ? कहते हैं कि अंधेरे के पास बहुत वक्त होता है, प्रकाश हमेशा जल्दी में होता है। अंधेरा हमारे आसपास हर कहीं बिखरा है। हमारे बाहर भी और हमारे भीतर भी। वह रात के अंधेरे में भी है और दिन के उजाले में भी। हम हर समय उसे महसूस करते हैं। उससे भयभीत होते हैं। उससे मुक्त भी होना चाहते हैं और बार-बार उसकी तरफ लौट भी जाना चाहते हैं। हमारे चारो तरफ रौशनी भी है, लेकिन अंधेरे से हमारी पहचान इतनी गहरी है कि हम उसे अपने भीतर महसूस नहीं कर पाते। वह क्षण भर के लिए कौंधता है और लौट जाता है। अंधेरा शायद हमारे संस्कार और हमारी आदतों में है। हम अंधेरे में प्रकाश की तलाश करते तो हैं, लेकिन जरा देर उसमें रहने के बाद हमें फिर अंधेरे की तलब होने लगती है। अंधेरे के प्रति हमारा आकर्षण बहुत गहरा है। धर्म और अध्यात्म कहते हैं कि प्रकाश हमारा स्वभाव है। अंधेरा और कुछ नहीं, प्रकाश के अभाव का नाम है। हमारा दुनियावी अनुभव कहता है कि हमारा स्वभाव अंधकार है। बिना किसी प्रयास के अंधेर...

बदलाव (कविता) - शक्ति सार्थ्य

(चित्र साभार : गूगल) वो अपनी राह चलता गया उसे आने वाले किसी खतरे की चिंता न थी वो तो सिर्फ अपनी मंजिल ही देख पा रहा था हालांकि ये मुश्किल था वो अपनी कार्यक्षमता से हमेशा परिचित था उसका शतप्रतिशत का फार्मूला हमेशा कारगर रहता था वो निडर स्वभाव का था उसका यही स्वभाव उसकी ऊर्जा का बड़ा स्त्रोत था एक दिन जब वह कुछ अलग ट्राई करने लगा उसे विश्वास था अपने सभी पुराने अनुभवों से जब भी वह कुछ करता उसमें सफल होता शायद आज भी उसी उम्मीद में था कुछ नागवार लोग उसके वर्षों के कार्यों पर- पानी फेरने की जुगत में लगे हुए थे वे हर बार नाकामयाब होते किंतु हर बार सीख लेते वो लोग भी अपने लक्ष्य के प्रति अडिग थे ठीक उतने जितना कि वो विश्वासी था दोनों की अपनी अपनी जंगें थी एक की हासिंल करने की दूसरे की नाकामयाब करने की कुछ चूक हुई इस बार उससे उसका लक्ष्य धराशायी था वो हताश अब भी नहीं था क्योंकि उसे इस बात की खुशी थी- वो जो लक्ष्य को नाकामयाब करने वाले थे अब भी नाखुश नज़र आ रहे थे शायद उनकी चिंता इस ओर अधिक थी कि काश हमने भी अपने कुछ करने के लक्ष्य तय किये होते जिससे दोन...

इंटरनेट का टोटल वजन कितना है - विजय सिंह ठकुराय

                         (चित्र गूगल से साभार) इंटरनेट का टोटल वजन कितना है? ●How Much Does The Information Weigh?● . इंटरनेट का इस्तेमाल करते हुए आपमें से हर किसी ने अपने जीवन मे कभी ना कभी कोई ना कोई ईमेल जरूर भेजी होगी। तो एक ईमेल का कोई वजन भी होता है क्या? एक 50 Kb की ईमेल का विश्लेषण करते हैं। . चूंकि एक किलोबाइट में 1024 बाइट होती हैं और एक बाइट में 8 बिट... इसलिए 50 किलोबाइट में टोटल बिटों की संख्या हुई 50×1024×8= 409600.... एक सर्किट में आधी बिट्स 0 को प्रदर्शित करतीं हैं और आधी 1 को जिसे हम बाइनरी लैंग्वेज के तौर पर जानते हैं। अब 0 का अर्थ सर्किट का ऑफ होना है इसलिए हम उन्ही बिट्स को काउंट करेंगे जिनका फंक्शन 1 को रिप्रेजेंट करना है यानी लगभग आधी (204800) . अब हम जानते हैं कि एक बिट का निर्माण के लिए लगभग 40000 इलेक्ट्रॉन्स की जरूरत होती है। यानी 204800 बिट्स के लिए आवश्यक इलेक्ट्रॉन्स की संख्या लगभग 8 अरब हुई। . अब चूंकि एक इलेक्ट्रान का वजन लगभग 9.1×10^-31 किलोग्राम होता है इसलिए 8 अरब इलेक्ट्रान...

सेंधा नमक : भारत से कैसे गायब कर दिया गया, शरीर के लिए Best Alkalizer है - विनोद कुमार

सेंधा नमक : भारत से कैसे गायब कर दिया गया, शरीर के लिए Best Alkalizer है :- आप सोच रहे होंगे की ये सेंधा नमक बनता कैसे है ?? आइये आज हम आपको बताते हैं कि नमक मुख्य कितने प्रकार होते हैं। एक होता है समुद्री नमक दूसरा होता है सेंधा नमक (rock salt) । सेंधा नमक बनता नहीं है पहले से ही बना बनाया है। पूरे उत्तर भारतीय उपमहाद्वीप में खनिज पत्थर के नमक को ‘सेंधा नमक’ या ‘सैन्धव नमक’, लाहोरी नमक आदि आदि नाम से जाना जाता है । जिसका मतलब है ‘सिंध या सिन्धु के इलाक़े से आया हुआ’। वहाँ नमक के बड़े बड़े पहाड़ है सुरंगे है । वहाँ से ये नमक आता है। मोटे मोटे टुकड़ो मे होता है आजकल पीसा हुआ भी आने लगा है यह ह्रदय के लिये उत्तम, दीपन और पाचन मे मदद रूप, त्रिदोष शामक, शीतवीर्य अर्थात ठंडी तासीर वाला, पचने मे हल्का है । इससे पाचक रस बढ़्ते हैं। तों अंत आप ये समुद्री नमक के चक्कर से बाहर निकले। काला नमक ,सेंधा नमक प्रयोग करे, क्यूंकि ये प्रकर्ति का बनाया है ईश्वर का बनाया हुआ है। और सदैव याद रखे इंसान जरूर शैतान हो सकता है लेकिन भगवान कभी शैतान नहीं होता। भारत मे 1930 से पहले कोई भी समुद्री नमक नहीं खा...

द स्लीपिंग ब्यूटी - ध्रुव गुप्त

द स्लीपिंग ब्यूटी ! आज गूगल पर सर्च के दौरान एक ऐसी तस्वीर मिली जिसे देखकर देर तक ठिठका रह गया। तस्वीर सोई हुई एक छोटी बच्ची की थी जिसकी मासूमियत और रहस्यमयता ने उसके बारे में कुछ ज्यादा जानने को विवश किया। खोजबीन करने पर जो कुछ पता चला वह दिल दहला देने वाला था। यह जीवंत तस्वीर वस्तुतः किसी सोती हुई बच्ची की नहीं, लगभग सौ साल पुरानी रोसलिया लबाडरे नाम की दो साल की बच्ची की एक लाश की है जिसे ममी बनाकर इटली के सिसली शहर के एक रहस्यमय अंडरग्राउंड कब्रिस्तान कापुचिन कटाकोम्बे में सुरक्षित रखा गया है। इस अनोखे अंडरग्राउंड कब्रिस्तान की विचित्रता यह है कि यहां लाशें दफनाई नहीं, ममी बनाकर दीवारों पर लटका दी जाती हैं। ऐसी आठ हजार से ज्यादा मम्मियां कब्रिस्तान में सुरक्षित हैं। प्राप्त जानकारी के अनुसार पहली ममी 1599 में पादरी ब्रदर सिल्वेस्ट्रो की बनाई गयी थी। 1880 में अधिकृत रूप से इस कब्रिस्तान को बंद कर दिया गया था, लेकिन विशेष परिस्थिति में 1920 में इस कब्रिस्तान में आखिरी ममी दो साल की रोसलिया की बनाई गयी। यह इस कब्रिस्तान में रखी गयी सबसे खूबसूरत ममी है क्योकि इस जीवंत ममी को देखक...

मोदी जी के फिटनेस चैलेंज का सही अर्थ

प्रधानमंत्री मोदी जी की उम्र क्या है ? तकरीबन 68 वर्ष के है। व्यस्ततम व्यक्ति हैं अपने योगा का विडिओ डाले हैं किसलिए ? क्या इससे वोट मिलेगा ? या राहुल गांधी परास्त हो जायेंगे ? महागठबंधन टूट जाएगा ? 68 वर्ष का व्यक्ति हमें प्रेरित कर रहा है की आलस का त्याग करो। योग जिसकी खोज हमारे मनीषियों ने की थी ,आज उसके बारे में हमसे ज्यादा पश्चिमी देश जानते है। कितने लोग सूर्य नमस्कार को जानते है ? कितने लोग सूर्योदय से पूर्व उठ कर सूर्योदय के समय यह करते है ? धर्म और पूजा पाठ के नाम पर सिर्फ चौरंच रचने वाले ,ये भूल जाते है की सूर्य प्रत्यक्ष देव है। ऊर्जा के स्रोत है। उनके आने पर उन्हें नमस्कार करना चाहिए। यही धर्म का विधान है। बहुत से लोग ऐसा पूछते है की डाक्टर साहब रीढ़ की हड्डी में दर्द है , घुटने में दर्द है , फलाना ढिमका हो गया है। क्या परहेज और एक्सरसाइज करे ? अरे ये सब रोग तुम्हारे काहिलपन के कारण हुए है . एक मोहतरमा से मेरी बहस हुई थी  जब मैंने रह्युमेटोइड आर्थराइटिस पर पोस्ट किया था। मैंने लिखा था की सी रिएक्टिव प्रोटीन के कारण शरीर का अपना इम्म्यून सिस्टम खुद की सेल को ...

ब्राज़ील का अभिशाप - सुशोभित सिंह सक्तावत

ब्राज़ील का अभिशाप! _______________________________________________________ [ यह लेख पढ़ने के लिए आपका फ़ुटबॉल का दीवाना होना ज़रूरी नहीं है, लेकिन यह लेख पढ़ने के बाद आप फ़ुटबॉल के दीवाने ज़रूर बन जाएंगे! ] ये एक अभिशाप की कहानी है! ये "मराकानाज़ो" का अफ़साना है! ऐसा कम ही होता है कि कोई एक खेल मुक़ाबला किसी मुल्क़ के सामूहिक अवचेतन पर इस तरह से हावी हो जाए कि वह उसके राष्ट्रीय स्वरूप का पर्याय बन जाए। एक प्रेतबाधा की तरह जिससे पिंड छुड़ाना मुश्‍िकल साबित होने लगे! साहेबान, यह खेलों के इतिहास की सबसे बड़ी किंवदंती है। सबसे बड़ी गुत्थी भी कि आख़िर ऐसा कैसे हुआ। 1950 का फ़ुटबॉल विश्वकप फ़ाइनल। टीमें : ब्राज़ील और उरुग्वे। मैदान : रियो दी जैनेरियो का मराकाना स्टेड‍ियम। यह एक फ़ाइनल मैच कम और एक “करोनेशन” अध‍िक माना जा रहा था : व‍िश्व फ़ुटबॉल में ब्राज़ील की श्रेष्ठता का जयघोष। यहां तक कि यह तक भुला दिया गया था कि मैच खेला जाना अभी बाक़ी है, ब्राज़ी‍लियों ने पहले ही जीत का जश्न मनाना शुरू कर दिया। अख़बारों ने पहले ही ब्राज़ील को “विश्व चैंपियन” कहना शुरू कर दिया। ...