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सफलता हमारी सोंच की ही एक उपज है : शक्ति सार्थ्य

सफल होना हर किसी का स्वप्न होता है चाहे वह कैसी भी सफलता क्यों न हो ? समाज का हर वो व्यक्ति जो कहीं न कहीं इस सोंच से जुड़ा रहता है कि धन आदि अर्जित करना ही सफलता का एक बड़ा उदाहरण है। निसंदेह वह गलत सोंचता है। बल्कि सफलता इससे कोसों दूर कहीं एक ऐसी जगह पर अडिग है जहां पर वह पहुंचना तो चाहता है किंतु समझ ही नहीं पाता और सारा श्रेय धन अर्जन की स्थिति को दे बैठता है। धन अर्जित करना एक तरह की बिशेष कला जिसका सफलता से कहीं दूर-दूर तक कोई संबंध ही नहीं है। धन अर्जन करते करते वह व्यक्ति एक तरह की ऐसी आदत बल्कि हम इसे इगो भी कह सकते को डेवलप कर लेता हैं जो समाज को धन का बुनियादी ढांचा समझ लेता हैं और उसे ही सफलता का नाम देने से कतई नहीं चूंकता। वो इस बात के भ्रम में हैं कि वह सबसे सफल व्यक्ति है। हां धनी जरूर है वह। सफलता यूं ही हाथ नहीं लगती। इसे पाने के लिए हमें एकाग्रचित होकर जुटना होता है, अपने उस लक्ष्य की ओर जो हमने सफल होने के लिए निर्धारित किया है। शायद ये लक्ष्य इतना विशाल और जटिल होता है कि हमारी एकाग्रता हर-पल हर-मोड़ पर डगमगाने लगती है। जो डट कर सामना करते हैं श...

बिहार बनाम शिक्षा : कुमार प्रियांक

दिल्ली यूनिवर्सिटी में अच्छी-खासी संख्या बिहार से, पंजाब-महाराष्ट्र-कर्नाटक-तमिलनाडु इत्यादि के विभिन्न इंजीनियरिंग कॉलेज में डोनेशन से पढ़ने वाले अधिसंख्य बच्चे बिह...

5 साल से सूखाग्रस्त इस देश में पानी के लिए कत्लेआम

इस समय पूरी दुनिया पानी के संकट से जूझ रही है और सुनने में आता है कि अगला वर्ल्ड वॉर पानी के लिए हो सकता है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण है अफ्रीकी देश केन्या, जो पिछले  5 साल के भीषण स...

खोज: कृत्रिम रक्त से दूर होगी अस्पतालों में खून की कमी

अस्पतालों में किसी गंभीर ऑपरेशन या डेंगू जैसी बीमारी के बड़े पैमाने पर फैलने पर खून की कमी का सामना करना पड़ता है। इस समस्या को जड़ से खत्म करने की कोशिशों में लगे विशेषज्ञ लैब में कृत्रिम रक्त बनाने के करीब पहुंच गए हैं। इस सफलता के साथ पिछले 20 वर्षों से जारी प्रयोग चरम पर पहुंच गया है। बोस्टन चिल्ड्रेन्स हॉस्पिटल के वरिष्ठ शोधकर्ता डॉक्टर जॉर्ज डेले और हार्वर्ड मेडिकल स्कूल के डीन ने बताया कि उनकी टीम प्रयोगशाला में मनुष्य का रक्त स्टेम सेल बनाने के काफी करीब पहुंच गए हैं। डॉ. डेले ने बताया कि उनकी टीम ने प्रयोगशाला में रक्त बनाने वाली स्टेम कोशिकाएं विकसित कर ली हैं। प्रयोग के दौरान देखा गया कि यह कोशिकाएं जब चूहों में प्रविष्ट की गईं तो वे विभिन्न तरह के मन्युष्य के रक्त ब्लड सेल बना पा रही थीं। विशेषज्ञों ने 1988 में ह्यूमन एंब्रियोनिक स्टेम सेल की पहचान कर ली थी। इसके बाद से ही इनके जरिये रक्त का निर्माण करने वाली स्टेम कोशिकाएं बनाने की कोशिशों में जुटे हुए हैं। अगर वे इस प्रयोग में सफल रहते हैं तो यह रक्त संबंधी बीमारियों से जूझ रहे लोगों के लिए जीवन बदलने वाली उपलब्धि साबि...

जनकृति अंतरराष्ट्रीय पत्रिका का नया अंक (अंक 24)

जनकृति अंतरराष्ट्रीय पत्रिका का नवीन अंक (अंक 24, अप्रैल 2017) प्रकाशित। यह अंक आप पत्रिका की वेबसाईट (www.jankritipatrika.in) पर पढ़ सकते हैं। इस अंक में विभिन्न क्षेत्रों से विषय विविधता को ध्यान म...

रैनसमवेयर - फिरौती वसूलने वाला मैलवेयर : मयंक सक्सेना

ख़ैर चूंकि डिग्री साबित करने के लिए अब तकनीक पर ज्ञान पेलने ही लगा हूं तो आज रैनसमवेयर पर ज्ञान ले लीजिए...अरे, कन्फ्यूज़ मत होइए...ये वही प्रोग्राम है, जिसे वायरस-वायरस कह कर न्यूज़ चैनल हौवा फैलाए हुए हैं...तो थोड़ा सा ज्ञान इसके बारे में... तो साहेबान, रैनसमवेयर कोई नई चीज़ नहीं है...हां, फिलहाल वानाक्राय से लोग वाकई वानाक्राय कह रहे हैं...क्योंकि शायद इसके हमले के लिए लम्बे समय से तैयारी की जा रही थी और पिछले कई साल से इसके छोटे-मोटे हमलों को गंभीरता से नहीं लिया गया। रैनसमवेयर को हिंदी में फिरौतीवायरस कहा जा सकता है। क्योंकि दरअसल यह आपके सिस्टम में प्रवेश करने के बाद, फाइलों को इनक्रिप्ट कर के, एक ही अनजान फाइल फॉर्मेट में बदल देता है और वह खुलना बंद हो जाती हैं। क्योंकि अलग-अलग एप्लीकेशन अपने विशेष फाइल फ़ॉर्मेट को ही पहचान सकते हैं और यह उनके फाइल टाइप को ही बदल कर उनके कोड को इनक्रिप्ट कर देता है। यानी कि यह ट्रोज़न तरीके से आपके सिस्टम में घुसेगा, उसकी फाइलें बदल देगा और फिर आप उनको खोल नहीं सकेंगे। तस्वीरें, वर्ड प्रोसेसिंग डॉक्यूमेंट, फिल्में, गाने सब एक ही फाइल फॉर्मे...

सडेन कार्डियक अरेस्ट (आपबीती) : संजय सिन्हा

कल दफ़्तर से निकल ही रहा था कि मेरी निगाह टीवी स्क्रीन पर पड़ी और मेरे कदम ठिठक गए। ख़बर चल रही थी कि बड़ौदा में एक दूल्हे की शादी के मंडप तक पहुंचने से पहले ही मौत हो गई। वो अपने दोस्त के कंधे पर था और खुशी से झूम रहा था, अचानक वो बेहोश हुआ और मर गया। हमारे लिए ये खबर थी। एक सनसनीखेज़ खबर। जब कोई मर जाता है तो हमें लगता है कि ये खबर है। हमें ज़िंदगी में उतना रस नहीं मिलता, जितना मौत में मिलता है। सभी पत्रकारों के लिए ये ख़बर थी, लेकिन मेरे लिए दुख था, अफसोस था, शोक था, क्रोध था। 2 अप्रैल 2013 को मेरे पास पुणे से एक अनजान व्यक्ति का फोन आया था और उसने मुझसे सिर्फ इतना पूछा था कि क्या आप संजय सिन्हा बोल रहे हैं? मेरे हां कहते ही उसने कहा था शायद आपके छोटे भाई की तबियत बहुत खराब हो गई है। वो कुर्सी पर बैठे-बैठे ही लुढ़क गए हैं। फोन करने वाले ने मुझसे कहा नहीं था, लेकिन मैंने सुन लिया था कि वो कह रहा था कि उसकी सांस बंद हो गई है। मेरा जवान भाई, जो कभी बीमार नहीं पड़ा, साठ सेकेंड में इस संसार को छोड़ कर चला गया था। सबने कहा था, मैंने मान लिया था कि उसे अचानक दिल का दौरा पड़ा था और वो...