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सडेन कार्डियक अरेस्ट (आपबीती) : संजय सिन्हा

कल दफ़्तर से निकल ही रहा था कि मेरी निगाह टीवी स्क्रीन पर पड़ी और मेरे कदम ठिठक गए। ख़बर चल रही थी कि बड़ौदा में एक दूल्हे की शादी के मंडप तक पहुंचने से पहले ही मौत हो गई। वो अपने दोस्त के कंधे पर था और खुशी से झूम रहा था, अचानक वो बेहोश हुआ और मर गया। हमारे लिए ये खबर थी। एक सनसनीखेज़ खबर। जब कोई मर जाता है तो हमें लगता है कि ये खबर है। हमें ज़िंदगी में उतना रस नहीं मिलता, जितना मौत में मिलता है। सभी पत्रकारों के लिए ये ख़बर थी, लेकिन मेरे लिए दुख था, अफसोस था, शोक था, क्रोध था। 2 अप्रैल 2013 को मेरे पास पुणे से एक अनजान व्यक्ति का फोन आया था और उसने मुझसे सिर्फ इतना पूछा था कि क्या आप संजय सिन्हा बोल रहे हैं? मेरे हां कहते ही उसने कहा था शायद आपके छोटे भाई की तबियत बहुत खराब हो गई है। वो कुर्सी पर बैठे-बैठे ही लुढ़क गए हैं। फोन करने वाले ने मुझसे कहा नहीं था, लेकिन मैंने सुन लिया था कि वो कह रहा था कि उसकी सांस बंद हो गई है। मेरा जवान भाई, जो कभी बीमार नहीं पड़ा, साठ सेकेंड में इस संसार को छोड़ कर चला गया था। सबने कहा था, मैंने मान लिया था कि उसे अचानक दिल का दौरा पड़ा था और वो...

विनोद खन्ना में एक बेचैन और भटकती आत्मा के दर्शन होते हैं मुझे : ध्रुव गुप्त

मरने वाला कोई ज़िंदगी चाहता हो जैसे ! विनोद खन्ना आज हमारे बीच नहीं रहे। उनके बारे में मैं जब भी सोचता हूं, उनमें एक बेचैन और भटकती आत्मा के दर्शन होते हैं मुझे। जीवन की तमाम उपलब्धियों से परे अज्ञात की तलाश में निकला हुआ एक व्यक्ति। भारत विभाजन बे बाद भारत आये एक संपन्न व्यापारी परिवार की संतान विनोद खन्ना का दिल व्यापार में नहीं था। उनकी तलाश कुछ और थी। 1968 में सुनील दत्त की फिल्म 'मन का मीत' में एक खलनायक के तौर पर उनकी फ़िल्मी पारी शुरू हुई जो खलनायकी के कई-कई मीलस्तंभ पार करते हुए नायकत्व तक पहुंची। सातवे दशक में वे अमिताभ बच्चन, धर्मेंद्र और राजेश खन्ना के साथ हिंदी सिनेमा के सबसे लोकप्रिय नायकों की क़तार में शामिल थे। शिखर कुछ दूर नहीं था, लेकिन यहां भी उनकी तलाश ने भटका दिया। 1982 में सब छोड़-छोड़कर वे पहुंच गए ओशो के आश्रम में। ओशो के जूठे बर्तन धोए, उनके बाग़ के माली बने और उनके सबसे अंतरंग शिष्य भी।आश्रम के उनके समकालीन साधक बताते हैं कि आश्रम के पांच सालों में आध्यात्मिक उपलब्धियों का शिखर उनसे दूर नहीं था जब वे आश्रम त्याग कर घर लौट गए। 1987 में फिल्मों में उनकी वाप...

तुम्हारी तरह (कविता) : वीरु सोनकर

-तुम्हारी तरह - मुझे एक स्थिर-बिंदु की तरह लो मैं मान लूंगा, यहाँ से आगे जाया जा सकता है मुझे लो अंधकार की तरह मैं खुद को आकाशगंगा के सभी छोरो तक बिखरा मान लूंगा या फिर प्रकाश की तरह लो शायद मैं तुम्हारी आँखों में आ कर बैठ जाऊं तुम मुझे झरना भी मान लेना पर ध्यान रखना मेरे गुप्त-स्रोत में ही मेरा सौंदर्य है एक विचार मानना, जो तुम्हारे पक्ष में आ जाने की हद तक मुलायम है एक विद्रोह की तरह भी, जो सबसे सहमत होने की प्रत्याशा में खुद से किया गया था एक देश ही मान लेना तुम, जो गांवों में बसता था जिसके तमाम नागरिक शहरों में लापता थे एक बीता हुआ बरस समझना, जो बीतने के बाद भी सदी के चेहरे पर ठहरा है जो तुम्हारे इस बरस तक भी बार-बार आ धमकता है नारे की तरह भी ले सकते हो मुझे तुम, सावधानी इस बात में है कि मैं तुम्हारे मुँह से न निकल आऊँ यूं ही किसी बातचीत में, मुझे तुम आयी-गयी बात सा भी ले सकते हो बहुत संभव है मैं किसी गंभीर मुद्दे सा वहीं ठहर जाऊं कविता में चला आया, मेरा आत्मसाक्षात्कार हो सकता है तुम्हारे ही चिंतन का प्रतिरूप हो अगर लेना बहुत अनिवार्य हो मुझे, तो लेना मुझे ...

GBU 43 Or MOAB (Massive Ordnance Air Blast) : अजीत सिंह

अमरीका के पास एक बम है । उसका technical नाम तो GBU 43 है पर आम बोलचाल की भाषा मे उसे MOAB कहते हैं । MOAB बोले तो Massive Ordnance Air Blast . इसके अलावा MOAB को Mother Of All Bombs भी कहा जाता है । पर मुझे अगर हिंदी में कहना होगा तो मैं इसे सभी बमों का बाप कहूंगा । धरती पे अब तक जितने भी विध्वंसक बम हैं उनमें Atom Bomb के बाद दूसरा नंबर इस MOAB का ही आता है । इसकी खासियत ये है की ये बहुत बड़ा होता है । बड़ा माने बहुते बड़ा । मने इसका वज़न 21,600 पौंड होता है मने 9525 किलो का बम ........ इसे आप ऐसे समझ सकते हैं कि किसी ने एक truck अत्यंत ज्वलनशील बारूद आपके शहर के बीचों बीच फोड़ दिया हो ........ और इसे F16 जैसे किसी लड़ाकू विमान से नही बल्कि भारी भरकम मालवाहक Hercules विमान से गिराया जाता है । गौर कीजिए इसे निशाने पे दागा नही जाता बल्कि गिराया जाता है , वो भी Parachute से । मने आसमान से मौत अचानक नही बल्कि धीरे धीरे टपकती है । मने आप अपनी मौत को अपनी तरफ आते देख सकते हैं ...... धीरे धीरे धीरे ...... इस बम में technology जो प्रयोग में लायी जाती है की bomb जब फटता है तो इससे बड़ी भयं...

सुना था कि वो इश्क का खुदा है मगर : शक्ति सार्थ्य

सुना था कि वो इश्क का खुदा है मगर/ ___________ शहरोँ मेँ खेल बही पुराना छोड़ आए उन्हे अब हम खुद से सताना छोड़ आए दिल मेँ उठ रहे कुछ अनबुझे से गुबार क्योँ करके प्यार निभाना छोड़ आए जिक्र ...

बतख मियां के गांधी : ध्रुव गुप्त

महात्मा गांधी के चंपारण सत्याग्रह के सौ साल पूरे होने पर बापू अभी चर्चा में हैं। मैं थोड़ी सी चर्चा उस शख्स की करना चाहता हूं जो अगर न होता तो न गांधी नहीं होते और न भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास वैसा होता जैसा हम जानते हैं। वे शख्स थे चंपारण के ही बतख मियां। बात 1917 की है जब दक्षिण अफ्रीका से लौटने के बाद चंपारण के किसान और स्वतंत्रता सेनानी राजकुमार शुक्ल के आमंत्रण पर गांधी डॉ राजेन्द्र प्रसाद तथा अन्य लोगों के साथ अंग्रेजों के हाथों नीलहे किसानों की दुर्दशा का ज़ायज़ा लेने चंपारण आए थे। चंपारण प्रवास के दौरान जनता का अपार समर्थन उन्हें मिलने लगा था। लोगों के आंदोलित होने से जिले में विधि-व्यवस्था की समस्या उत्पन्न होने की आशंका थी। वार्ता के उद्देश्य से नील के खेतों के तत्कालीन अंग्रेज मैनेजर इरविन ने मोतिहारी में उन्हें रात्रिभोज पर आमंत्रित किया। तब बतख मियां इरविन के रसोईया हुआ करते थे। इरविन ने गांधी की हत्या के लिए बतख मियां को जहर मिला दूध का गिलास देने का आदेश दिया। निलहे किसानों की दुर्दशा से व्यथित बतख मियां बतख मियां को गांधी में उम्मीद की किरण नज़र आ रही थी। उनकी अं...

कुछ भी हिला देने जैसा नहीं : शक्ति सार्थ्य

दुनिया मेँ कुछ लोग सिर्फ मरने के लिए ही पैदा नही होते बल्कि मरने के बाद भी जीवित रहने की कूबत रखते है। हाँ, ऐसे न जाने कितने महान व्यक्तित्व है जो आज हमारे बीच नहीँ होते हुए भी हमारे मार्गदर्शक और प्रेरणा-स्त्रोत बने हुए है। मुझे नहीँ लगता कि आपको उन व्यक्तियोँ के नाम गिनायेँ जाए। हम आए दिन उनके व्यक्तित्व से मुख़ातिब होते रहते है। दूसरोँ को भी उनके विचारोँ से अवगत कराते रहते है। हम उनके द्वारा किये गये महान कार्योँ की सराहना करते हुए प्रत्येक बर्ष उनकी याद मेँ एक मेले का आयोजन करते है। जगह-जगह उनकी सभायेँ लगाते है। प्रत्येक बर्ष उनके बतायेँ मार्गदर्शन पर चलने की कसमेँ खाते है। अब सवाल ये है कि ?? वो लोग ऐसा क्या कर गये जिन्हे भुला पाना आसान नहीँ? और हम अब ऐसा क्या कर रहे जो हमेँ लाईन पर लाने के लिए उनके विचारोँ का अनुसरण कराया जाता है? क्योँ हम अपने और उनके बीच सामजंस नही बिठा पाते? क्योँ हम अपनी मानसिकता उनकी जैसी नहीँ कर सकते? क्योँ हम अपना स्वार्थ नहीँ छोड़ते? क्या उनका परिवार नहीँ था? क्या उनका अपना समाज नहीँ था? क्या उन्हे चैन से रहने की अनुमति नहीँ थी? क्या वे एक मानव नहीँ...