वक़्त, मैं और किस्मत : समय-बोध, संवेदना और आत्मसंघर्ष की काव्य-यात्रा समकालीन हिंदी कविता के परिदृश्य में “वक़्त, मैं और किस्मत” एक ऐसी कृति के रूप में उभरती है, जो निजी अनुभवों को व्यापक मानवीय संदर्भों से जोड़ने का सार्थक प्रयास करती है। यह संग्रह केवल कविताओं का संकलन नहीं, बल्कि एक संवेदनशील मन की आत्मकथा है, जो समय, नियति और मनुष्य के बीच चल रहे जटिल संवाद को शब्दों में रूपायित करती है। समय की केंद्रीय उपस्थिति इस काव्य-संग्रह की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता इसका समय-बोध है। कवि ‘वक़्त’ को केवल काल-गणना का माध्यम नहीं मानता, बल्कि उसे एक जीवंत सत्ता के रूप में प्रस्तुत करता है। समय यहाँ कभी कठोर शिक्षक है, कभी मौन साक्षी और कभी जीवन की दिशा तय करने वाला अदृश्य नियंता। कविताओं में बार-बार यह अनुभव उभरता है कि मनुष्य अपनी इच्छाओं और प्रयत्नों के बावजूद समय के प्रभाव से मुक्त नहीं हो सकता। कवि समय से संवाद करता है, उससे प्रश्न करता है और कई बार उससे संघर्ष भी करता है। यह संघर्ष व्यक्तिगत होते हुए भी सार्वभौमिक है। पाठक अपने जीवन के अनुभवों को इन पंक्तियों में प्रतिबिंबित पाता ...
"एक प्रयास.., मुकम्मल प्रस्तुति का"