Skip to main content

Posts

नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के अनमोल वचन

आज २३ जनवरी, हमारे देश के निडर एवं प्रभावशाली नेता सुभाष चन्द्र बोस जी की जयंती है। इस जयंती के मौके पर हम नेताजी को उनके द्वारा दिये गये उनके प्रसिद्ध भाषण एवं उनके जीवनकाल में उनके मुखरबिंदु से अवतरित कुछ अनमोल वचनों को याद करते हुए उन्हें श्रृद्धांजलि अर्पित करते हैं ! रंगून के 'जुबली हॉल' में सुभाष चंद्र बोस द्वारा दिया गया भाषण सदैव के लिए इतिहास के पन्नो में अंकित हो गया जिसमें उन्होंने कहा था - "स्वतंत्रता संग्राम के मेरे साथियों! स्वतंत्रता बलिदान चाहती है। आपने आज़ादी के लिए बहुत त्याग किया है, किन्तु अभी प्राणों की आहुति देना शेष है। आज़ादी को आज अपने शीश फूल की तरह चढ़ा देने वाले पुजारियों की आवश्यकता है। ऐसे नौजवानों की आवश्यकता है, जो अपना सिर काट कर स्वाधीनता की देवी को भेंट चढ़ा सकें। तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा। खून भी एक दो बूँद नहीं इतना कि खून का एक महासागर तैयार हो जाये और उसमें मैं ब्रिटिश साम्राज्य को डूबो दूँ ।" नेताजी के जीवनकाल में उनके मुखरबिंदु से अवतरित कुछ अनमोल वचन- # राष्ट्रवाद मानव जाति के उच्चतम आदर्शों सत...

उसे हर दहकते मज़मे में भी लड़ता मान गया : शक्ति सार्थ्य

मैं जब भी गया वहां वो जान गया उसकी समझ को अब मैं जान गया हर उस चीज़ की जरूरत थी उसे जिसकी दीवानगी पर मैं हैरान गया एक ख्वाब था सीने में उसके लेकर उसे वो तो उसकी नाराजगी पर भी दीव...

शायद कोई सुनें (कविता) : शक्ति सार्थ्य

फाड़कर आज वह कागज के कुछ चन्द टुकड़े! जीवन को साथ, मन मेँ शान्ति भर काफिर बनेँ फिरे यही सोच लिये क्रूर बनेँ उमंग के चेतना मेँ कलाम को भूलकर तिरस्कार पर उतरे मेधावी सोच अब भीरु न बनेँ अटक तो निकल पड़ी लम्बीँ यात्रा पे, वुजदिल नहीँ वह बिधु का सम्मान करती और आत्म संस्कार भी शिकस्त-काया भर चुकी बिषाद-बृन्द डूबने लगी अन्ध-उर मेँ दीन सरोरुह खिल उठा सुन मेरी ध्वनि न चलूं मैँ आज टुकड़ोँ पर ब ड़ा नागर है ये सहन कर ये मुझे वदनाम करेगा बड़ा तिरस्कार होगा उनका और सम्मान भी जो भूमि से विहग-बृन्द उड़ाकर शयन करेगेँ शायद कोई सुने नीर की ध्वनि, जो अपना हक मागंता और कहता तड़प उठोगे तुम, न होने पर मेरे! © शक्ति सार्थ्य shaktisarthya@gmail.com [चित्र साभार गूगल]

मौला तुम..! (कविता) : शक्ति सार्थ्य

मौला तुम..! मौत की दहलीज़ पर बैठा हूँ, खुद को सब्र देने.., मौला तुम इतना अता करना कि चलने न पाये उनको मेरी मौत का पता आये मेरे राख के ढेर पर एक आँधी, मिला देना मौला तुम मुझे, जहाँ हो बंजर जमीं भले ही न मिले मुझे अन्तिम स्नान किंतु पिला देना तुम पानी चिड़ियोँ के दुश्मन बाज को मौला लेकर सन्देश मेरा, तुम ! बरसा देना उन शहीदोँ पर जिन्हे मै सलाम न कर सका ! पैगाम-ऐ-मोहब्बत का लेकर धूप से मिला देना छाँव को तुम, मौला ! मौला ! करना करम इतना इस धरती पर तुम जिये मरने के बाद भी गरीब किसानो की हुकुमतें, चले हवा राहतों की बरसे प्यार उनमें ठोकरें भी खुद ठुक जाये गढ़ी रहने के तत्पश्चात भी चाहें बन्द क्यों न रह जायें, मेरी आँखे खुली रह जायें, ये धरती करने सम्मान तेरा, मौला ! [जनवरी २०१३] © शक्ति सार्थ्य ShaktiSarthya@gmail.com [नोट- चित्र साभार गूगल]

अब तन की भी फ़िक्र रही है किसे : शक्ति सार्थ्य

कोई ठौर नहीं हैं चाहतों का बस दौर चला है बातों का तस्वीर तेरी अभी भी हैं कैद सीने में कुछ और नहीं, बस खज़ाना हैं यादों का मर गया था उसी दिन वो कातिल मेरा जब कत्ल हुआ था मेरे अरमानों का अब तन की भी फ़िक्र रही है किसे जब से दिल बसेरा हुआ है सायों का न मौजों में की चाहत बची है न घरौंदों की जब से दिल ही बाजार हुआ सौदों का [१०/०१/२०१८] © शक्ति सार्थ्य ShaktiSarthya@gmail.com [नोट- चित्र साभार गूगल]

नूतन वर्ष में प्रवेश : शक्ति सार्थ्य

साल २०१८ का उसके प्रथम दिवस के साथ स्वागत है। यह कितना महत्वपूर्ण है कि आज हम एक नये वर्ष में प्रवेश कर गये हैं। हमारा प्रवेश भी हमारी अपनी निजी चुनौतियों से शुरू होकर सामाजिक चुनौतियों तक संघर्षरत हैं। हम जो चाहते हैं शायद वो करने की कोशिश की बजाए किसी अन्य दिशा की ओर प्रस्थान कर जाते हैं। ये अक्सर जब भी होता है हम तब भी समझ नहीं पाते। और अंततः जब वो सब घटित हो जाता है जो अनचाहा होता है तब हम खुद को कोसने के बजाए किसी और को कोसते हैं। शायद तकदीर को। हां हम सारा दोष तकदीर पर मढ़ देते हैं। हमने शायद कभी ये सीखा ही नहीं कि हम कभी अपने को दोष दे सकें। ये तो हमारी मान-मर्यादा के एक दम विपरीत है। हमें अपनी मान-मर्यादा को समाज में जो दिखाना हैं। अब मैं यहां ये समझ पाने में असमर्थ हूं कि आखिर ऐसा होता क्यों है? क्या हम अपनी कायरता से डरते हैं? क्या हम समाज को एक मात्र धोखे में रखना चाहते हैं? क्या समाज सच में धोखे में रह जायेगा? ये तो सब, बस हमारी एक छोटी-सी सोंच का ही परिणाम है। फिर हम ऐसा सोचते ही क्यों हैं? बहुत से प्रश्न है जो एका-एक हमारे मस्तिष्क में भ्रमण कर रहे होते हैं। फिर भी हम...

नववर्ष के स्वागत में : शक्ति सार्थ्य

आज साल २०१७ का समापन दिवस है। ये साल कई मायनों में महत्वपूर्ण रहा। मैं यहां महत्वता की बात नहीं करूंगा और ना ही उसकी जिसकी बजह से इसकी महत्ता को कम कर दिया जाए। मैं यहां चर्चा करना चाहूंगा तो सिर्फ आत्मज्ञान की, दर्शन की, क्षमायाचना की, एक नई सीख की और उस योजना की जिसको कतई महत्वपूर्ण नहीं समझा गया मेरे द्वारा। इस वर्ष हमारी चेतना जितनी जागृत होनी थी, हो ली। अब हम इसमें कुछ भी नहीं कर सकते। हम किन-किन मायनों में जागृत हुए और सिर्फ किस एक सही मायने में जागृत होकर हम क्या कर सकते थे? ये हम सभी भलि-भांति जानते हैं। क्योंकि हम ही खुद को सबसे ज्यादा जान सकते हैं। हम खुद की ही उन पहलुओं पर चर्चा करके खुद से ही बड़ी आलोचना कर सकते हैं। जिसका हम शायद (शायद क्या? सच में) एक बेहतर परिणाम निकाल सकते हैं। मैं अपनी बात की शुरुआत स्वामी विवेकानंद जी के इस कथन से करना चाहूंगा- "किसी चीज़ से डरो मत। तुम अद्भुत काम करोगे, यह निर्भयता ही है, जो क्षणभर में परम आनंद लाती है।" स्वामी जी के इस कथन में जितनी सच्चाई है अपितु उससे कहीं अधिक इसकी प्रामाणिकता में गहराई भी है। हम न जाने क्यों हर...